संदेश

वेदना भारत माँ की

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रात सपनों में मिली वो, द्रवित होकर रो रही थी। देख ले आँसू न कोई, इसलिए मुंह धो रही थी।। थी छिपाती दर्द अपने, पर न छिपती अश्रुधारा। लग रहा कि उसे अपनों, ने किया था बेसहारा।।                              देखकर उसको लगा कि, दर्द कुछ उसके बंटा लूं।                              लग रहा अपना है कोई, हाल का उसके पता लूं।।                              पास जब उसके गया तो, वो जरा सी मुस्कुराई ।                              उसने मेरा कुशल पूछा, पर जुबां थी लड़खड़ाई।। कहा माता मैं सुखी हूँ,पर व्यथा अपनी सुनाओ । तेज मुखमंडल सुशोभित, माँ पता अपना बताओ।। व्यंगमय थी हँसी उसकी, जब कहा क्या नहीं जाना। मैं वहीं भारत हूँ जिसको, तुमने अपना देश माना ।।                   ...

मित्रता

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  मित्रता ! एक अपूर्ण भावना, अतृप्त शब्द जिसकी तृप्ति को, शब्द भी पड़ जाते नि:शब्द क्या करें, शब्दों की अपनी सीमाएं हैं उनकी, कुछ भौतिक मर्यादाएं हैं जिसे, वे लांघ नहीं सकते मजबूर हैं, माफी भी मांग नहीं सकते।। मित्रता ! हर दिल की प्यास है कुछ , अच्छा होने की आस है किसी ने कहा, क्या ये जरुरी है बताऊं क्या, यह तो मजबूरी है क्या कहूं, अनकहा ज़िक्र है एहसास ही, कर देता बेफिक्र है।। मित्रता! नहीं मालूम कब होती है नहीं पता, कैसे और क्यों होती है ना जाने,  ये कौन सी हवा है सच कहूं,  हर मर्ज की दवा है मित्रों संग, खंडहर भी ताजमहल होता है साथ का, लाजवाब हर पल होता है।। मित्रता! एक विचार होता है सच्ची हो, तो सदाचार होता है और झूठ की, संभावना ही नहीं सच्ची नहीं, तो जानों मित्रता ही नहीं कांधे पर, जो उसका हाथ हो फर्क नहीं पड़ता, ग़म कितने साथ हों।।

स्वामी विवेकानन्द

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जड़ अविवेक की काट राम ने, बीज विवेक का बोया था जड़ता में घनघोर निशा की, आर्यवर्त यह सोया था दुनिया करती गर्व नरेंदर,आग लगाता पानी में देख के बंधन निज माँ के, वह अंतर्मन से रोया था ।।१।। उठो जगो कर्त्तव्य में रत हो, रुको नहीं बिन लक्ष्य लिए  चलो गिरो उठकर फिर दौड़ो नयनों में आदर्श लिए संघर्षों के बिना है कुछ भी मानवता को मिला नहीं मानव हो जानें से क्या गर ,पशुवत ही उपभोग किये ।।२।। सभी मरें या सभी बचेंगे , दो विकल्प बस दुनिया में आदर्शों का किला ढ़हा तो , सभी दबेंगे दुनिया में व्यक्ति व्यक्ति से अलग हुआ तो, फिर होगा व्यक्तित्व नहीं खुद से घर मिलना चाहो तो, मिलों परस्पर दुनिया में ।।३।।

प्रेम बच्चों सा

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  बच्चे दिल सा  लिखते और मिटा देते हैं। इशारों में प्यार करना वो सिखा देते हैं।। अपने आसन से हिलकर देखो तो दिल से मिलकर नन्हें फूलों सा खिलकर फटते बचपन को सिलकर हमको हमसे पल-भर में  मिला देते हैं। इशारों में प्यार करना वो सिखा देते हैं।। जो चाहे रहता होकर जब चाहें बनते जोकर लगती पाँवों में ठोकर फिर हँसदेते हैं रोकर बिछड़ते  हैं  जब तो रुला देते हैं। इशारों में प्यार करना वो सिखा देते हैं।। कुछ सच्ची वाली कसमें कुछ झूठे वाले वादे बस कच्ची सी उम्मीदें और पक्के जैसे इरादे सपनों वाली आँखे फिर दिला देते हैं। इशारों में प्यार करना वो सिखा देते हैं।।

छोटे सम्राट

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  मित्रों यह सम्राट कहानी की अगली कड़ी है , जो  आप में से ही कुछ मित्रों की माँग वो सलाह से प्रेरित है । आप ने पिछले भाग में सम्राट और उसके अतिमहत्वाकांक्षी दुर्बुद्धि का परिणाम देखा , परन्तु अब भी बहुत कुछ शेष था।                                 सम्राट का शावक, जिसे जानवर छोटा सम्राट कहते थे परन्तु  प्यार से नहीं डर तथा नफरत से। जंगल लगभग बरबाद हो चुका था, परन्तु शावक के जीवन का लम्बा सफर अब भी शेष था। जिसे जीने के बहुत से तरीके थे जैसे- हाल पर जिंदा रहना, परिस्थितियों को दोष देना या फिर सम्राट को कोसना। ये सब आसान प्रतीत होते हैं परन्तु शावक को घुट घुट कर जीना स्वीकार नहीं था, पर करे तो क्या? सिंह की संतान को आत्महत्या भी तो शोभा नहीं देता।                               शावक कुछ दिनों तक भूखे रहने के बाद दूसरे जंगल का रुख करता है, परन्तु सदा के लिए नहीं अपितु पेट भरने के लिए , शिकार तो आवश्यक था जीवन के लिए परन्तु अब ...

कृष्ण और कामना

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कृष्ण को चाह है यूं तो बृजधाम की। द्वारिका सत्य है किंतु घनश्याम की।। धार यमुना की मन में ही बहती रहे गोते सागर की लहरों में लेना ही है जिंदगी चलती है अपने ही ढंग से वो तो होता ही है जिसको होना ही है पीर पर भारी मुस्कान है श्याम की। कृष्ण को चाह है यूं तो बृजधाम की।। यूं तो दुनिया ही पलकें बिछाए मिली एक राधा ही मन को लुभाती उन्हें उनका जीवन अधूरी कहानी रहा दुनिया अवतार पूरा बताती उन्हें कृष्ण गाथा समर्पण की बलिदान की। कृष्ण को चाह है यूं तो बृजधाम की।। थाम  वंशी  बनें  प्रेम  के  देवता शांति का ले निवेदन तो जाना ही है नीति मजबूरियों की गुलामी नहीं शांति को युद्ध भारी रचाना ही है कृष्ण  का अर्थ  है  कर्म  निष्काम  ही । कृष्ण को चाह है यूं तो बृजधाम की।।   जो समय ने कहा पूरे मन से किया ये भी मालूम है सारा खो जायेगा द्वारिका स्वर्णनगरी प्रभु ने किया है पता कि ये सागर का हो जायेगा कृष्ण ही सार है श्रृष्टि अविराम की| कृष्ण को चाह है यूं तो बृजधाम की।।

नज़रें

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दिल का क्या है दिल का क्या है वह तो कभी भी भर जाता है और गढ़ता रहता है कुछ नया तुम भी मैं भी और हम दोनों और और कुछ भी नहीं जैसे कुछ हो ही नहीं निकट भविष्य में पर  मैं ग़लत था वहां सब कुछ है बस देखना था तुम्हारी नज़रों को मेरी नज़रों से, तुम्हारी नज़रों में और दिख जाते  हम अढ़ाई  वह... जो होना चाहिए जो होता है सब कुछ शाश्वत है नश्वर हैं तो मेरी नजरें जो देख नहीं पाती तुम्हारी नज़रों में।