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🌼जानकी स्तुति 🌼

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  जय जनक नंदिनी जानकी माँ, जय जय रघुवर की प्राणशक्ति जय भूमिसुता जय जगजननी, जय महामाया जय महाशक्ति आदर्श कल्पनाएँ हारी , तेरे जीवन दर्शन से माँ सारी भव बाधाएं मिटती, पल में तेरे दर्शन से माँ आनंद कंद हैं सुख राशि , श्रीराम महाप्रभु जगदीश्वर          वो भी तेरे गुणगान करें , जो जगती के हैं परमेश्वर      ||1|| हनुमंत संत हितकारी भी,सेवक बनकर हर्षित होते तेरे चरणों की सेवा में,ऋषि मुनिगण आकर्षित होते तुम ही तो भारत माता हो, हे सिंहवाहिनी जगदम्बा तुम दुर्गा काली मनोरमा,तुम ही हो सरस्वती अम्बा तुम से इच्छाएं पूरित हों, तुम में ही है माँ निहित मुक्ति            माँ साध्य साधना सब तुम, तुम्हारे ही एक स्वरुप भक्ति     ||2||    

लालसा नवमी की

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  अब तो मन की यही कामना,मुझमें राम जन्म हो जाये। शक्ति का पूजन हो पूरा, जीवन में नवमी आ जाये।।१।। जय जय जय जगदम्ब भवानी,  बेटे  की  बस  यही  कहानी। उनसे  ही  माँ  योग करा दे, जीवन  हो  जाये  नूरानी। ऐसी कृपा करो हे माता,राम राज्य हिरदय हो जाये। शक्ति का पूजन हो पूरा, जीवन में नवमी आ जाये।।२।। ईर्ष्या घृणा से दूर रहें माँ, मन से ना मजबूर रहें माँ। सियाराम आँखों में बसे हों, इसी नशे में चूर रहें माँ। रघुवीर धीर गम्भीर प्रभु,इन नयनों के जल में नहायें। शक्ति का पूजन हो पूरा, जीवन में नवमी आ जाये।।३।। हममें फूट पड़ी है माता, विपदा टूट पड़ी है माता। खुद का ही दुश्मन बन बैठे, ऐसी लूट पड़ी है माता। नर-बानर का योग कराया,हमको वो विद्या बतलाये। शक्ति का पूजन हो पूरा, जीवन में नवमी आ जाये।।४।। इतना प्रेम भरो हे माई, जिससे हमें मिले रघुराई। प्रेम छाँछ पीने से मइया, मिले नाचते कृष्ण कन्हाइ। ये इक्षा ढृण इतनी कर दो,रघुवर भी मोहित हो जाये। शक्ति का पूजन हो पूरा, जीवन में नवमी आ जाये।।५।।

भारतीय नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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  ये नया वर्ष अपने संग में, एक नया सवेरा लाया है। राम जन्म अग्रिम सूचना,जन जन तक पहुंचाया है।। १।। शक्ति पूजा की ऊर्जा से, भरी हुई हैं दसों दिशाएँ।  मानव मन उल्लसित हैं,भरी हुई हैं नव आशाएँ।  पकी बालियों से चेहरे पर,नया सवेरा आया है।  ये नया वर्ष अपने संग में, एक नया सवेरा लाया है।। २।।  वृक्षों की हैं लदी डालियाँ,नव पल्लव अरु नव फल से।  खुशियों की आशाएँ जागी, हैं आने वाले कल से।  मंगलमय हो नया वर्ष,मन का संदेश पठाया है।  ये नया वर्ष अपने संग में, एक नया सवेरा लाया है।।३।।

🕊️मलीन बस्ती🕊️

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शहर से गुजरते हुए, देखा मलीन बस्ती। चकाचौंध से शहर में डूबी हुई थी कश्ती ।। राजमहल के बगल में, खड़े हासिये के लोग  जैसे चने चबने के संग,रक्खे छप्पन भोग  हाँ चिंतित महलों के आगे, मैले बच्चों की मुस्काई  देख न्याय विधना के यारो, मेरी आँखें भर आयी  ये महंगे को ले रोते, वो सस्ते पर हँसती। चकाचौंध से शहर में, डूबी हुई थी कश्ती।। मत इतराओ महलों वाले, उसके संग में भी अविनाशी  खुशियाँ लूट लूट तुम हारे,पर उसकी ना दिखी उदासी  इनका भी कुछ ख्याल करो,रौब करो कम अपने बल पर  सत्ताधीश बनाने वाला, भडक ना जाये तेरे छल पर  किरदारों में उलझ कर,भूल गए जो हस्ती।  चकाचौंध से शहर में, डूबी हुई थी कश्ती।

होलिकोत्सव

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 मैं तेरे रँग रँगूं ,तुझ पे रँग हो मेरा। खुद  को देखूं जो मैं,आईना हो तेरा  ऐसी होली मने यारों अबकी दफा  सारी दुनिया में हो,प्यार का रंग भरा।।१ ।।                                      भांग का क्या नशा, हो नशा प्यार का                                      थोड़ा इकरार का,थोड़ा तकरार का                                       आ गले हम मिलें हर गिला भूल कर                                       खुद ये खुशियाँ भरे,सारे संसार का।।२।।  सारे दुख रात की,होलिका में जले और जल जाये,मन के सभी जलजले  लाख संघर्ष से हो भरा पथ मगर  होगा आसान जो ,साथ में हम चले।।३।।          ...

आनंद पथ

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  चल चला चल राही तू , इन पथरीली राहों पर। कांटे बन कर बिछे हुए हैं,मंजिल तेरी राहों पर।।१।। गर आसान हुई तो बोलो,क्या मतलब उन बाटों का जिसे देखकर डरे न कोई,क्या मतलब उन कांटों का कुछ पल चलो सम्हलकर साथी,फिसल न जाना आहों पर। कांटे बन कर बिछे हुए हैं , मंजिल तेरी राहों पर।।२।। कुछ पल को गर धीर धरा तो, मीठा दर्द मजा देगा लौट गये पग धरे बिना तो,कुण्ठा तुम्हें सजा देगा जीवन को है अगर समझना,करो भरोसा बाहों पर। कांटे बन कर बिछे हुए हैं,मंजिल तेरी राहों पर।।३।। सम्भव है चीखें भी आयें, फूलों के सपनें बहलायें शायद आकर कलियां बोलें, बहुत हुआ अब ये समझाएं हो कर मौन धरो पग आगे, कान न दो अफवाहों पर। कांटे बन कर बिछे हुए हैं,मंजिल तेरी राहों पर।।४।। मंजिल तो अदृश्य हो रही, आगे धुंधली राह दिखें है जहां पहुंचकर गति थम जाये,उस मंजिल की चाह किसे है पथ आनंद शून्य मत करना, मंजिल की परवाहों पर। कांटे बन कर बिछे हुए हैं,मंजिल तेरी राहों पर।।५।।

वेदना भारत माँ की

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रात सपनों में मिली वो, द्रवित होकर रो रही थी। देख ले आँसू न कोई, इसलिए मुंह धो रही थी।। थी छिपाती दर्द अपने, पर न छिपती अश्रुधारा। लग रहा कि उसे अपनों, ने किया था बेसहारा।।                              देखकर उसको लगा कि, दर्द कुछ उसके बंटा लूं।                              लग रहा अपना है कोई, हाल का उसके पता लूं।।                              पास जब उसके गया तो, वो जरा सी मुस्कुराई ।                              उसने मेरा कुशल पूछा, पर जुबां थी लड़खड़ाई।। कहा माता मैं सुखी हूँ,पर व्यथा अपनी सुनाओ । तेज मुखमंडल सुशोभित, माँ पता अपना बताओ।। व्यंगमय थी हँसी उसकी, जब कहा क्या नहीं जाना। मैं वहीं भारत हूँ जिसको, तुमने अपना देश माना ।।                   ...